Iron Lungs Paul Alexander Dath : आयरन लंग्स के जरिये जीवित रहने वाल पॉल अलेक्जेंडर का निधन जाने कैसे ख़राब फेफड़ो के बावजूत जी रहे थे

Iron Lungs के जरिये जीवित रहने वाल पॉल अलेक्जेंडर का निधन जाने कैसे ख़राब फेफड़ो के बावजूत जी रहे थे

Iron Lungs Paul Alexander Dath :  पॉल अलेक्जेंडर का हल ही में निधन हो गया इनके निधन के बाद इनकी आयरन लंग्स काफी चर्चा का विषय बना राह | आइए इसके बारे में जानते है की आयरन लंग्स (Iron Lungs) क्या होता है और यह कैसे कम करता है |

पॉल अलेक्जेंडर इन्हें पोलयो पॉल (Paul Alexander) के नाम से भी जानते थे इनका निधन 78 वर्ष की आयु में हो गया | पॉल अलेक्जेंडर के मृत्यु के बारे में उनके दोस्त  डैनियल स्पिंक्स ने बताया की उनका निधन हॉस्पिटल में हो गया था | इन्हें कुछ दिनों पहले कोरना वायरस से ग्रसित हो गए थे जिसके बाद उन्ह्को हॉस्पिटल में भर्ती किया गया था लेकिन अभी तक उनके मृत्यु का स्पष्ट कारण नहीं बताया गया है | लेकिन पॉल अलेक्जेंडर की हर तरफ इतनी चर्चा क्यों को रही है पॉल अलेक्जेंडर (Paul Alexander) इतने खास थे क्यों |

आयरन लंग्स
आयरन लंग्स

पॉल अलेक्जेंडर के मृत्यु के बाद उनके आयरन लंग्स (Iron Lungs) बहुत चर्चा हो रहा है | हम आपको इस अर्टिकल में आपको बताएँगे की आयरन लंग्स क्या होता है ? तथा यह कैसे कम करता है ? इंजीनियरिंग तथा चिकित्सा के क्षेत्र में इसे अलग- अलग नाम जानते है | जैसा की – टैंक रेस्पिरेटर,कैबिनेट रेस्पिरेटर, नेगेटिव प्रेशर वेंटिलेटर तथा और कई नामो से जानते है जब इसका निर्माण हुआ था तब यह एक जीवन रक्षक के रूप में कम करता रहा है | इसे आयरन लंग्स (Iron Lungs) के नाम से जानते है |

आयरन लंग्स किया है ?

आयरन लंग्स का नाम सुनने पर थोडा अजीब लगता है लेकिन इसे देखने पर यह एक ताबूत जैसे मशीन की तरह दिखता  है | लोगो के लिए यह मशीन एक वरदान से कम नहीं है जब 1952 में अमेरिका में पोलियो आउटब्रेक हुआ था ,तब इस बीमारी से ग्रसित अधिकतर बच्चे थे इसी समय पॉल को 6 वर्ष की आयु में पोलियो हो गया था | पोलियो इस्नके शरीर में इस्तना ज्यादा बढ़ गया था की फेफड़े तक को ख़राब कर चूका था जिससे उनको साँस लेने में दिक्कत होने लगा था |

 

आयरन लंग्स किस तरह कम करता है ?

पहली बार 1927 में आयरन फेफड़ा बनाया गया था जिसे पहली बार 1928 में एक नैदानिक सेटिंग में उपयोग किया गया था | इसका अविष्कार लुईस अगामिज शॉ तथा फिलिप ड्रिंकर ने स्कुल ऑफ पब्लिक हेल्थ में किया था | इस मशीन से एक पीड़ित लड़की की जान बचाया गया था इसके साथ-साथ कई और अन्य लोगो की जान इस मशीन के जारिए बचाया गया था | ड्रिंकर खास तौर पर कोयला के गैस से ग्रसित लोगो के उपचार के लिए अध्ययन के दौरान उन्हें लगा की आयरन फेफड़ा(Iron Lungs) के सहायता से जिन लोगो को साँस लेने में दिक्कत हो रही है या जीने फेफड़े ख़राब हो चुके है उनकी इससे सहायता की जा सकती है तथा इससे पोलियो से ग्रसित लोगो की भी मदत किया जा सकता है |

आयरन लंग्स स्टील से बना होता है इसमें सर कक्ष से बहर रहता है जबकि एक रबर कॉलर लगा रहा है इसके जरिए जो मरीज है उसका सर बहर की ओर निकला होता है पहले आयरन लंग्स (Iron Lungs) को इलेक्ट्रिक मोटर तथा कुछ वैक्यूम क्लीनर से वायु पंप के जारिए चलाया जाता था जो की वेंटिलेशन (ENPV) के जारिए कम करता है | इसे इस तरह बनाया गया है की मरीज को हवा आसानी से पहुंचाई जा सके तथा जरूरत के हिसाब से आक्सीजन मिल सकते | लेकिन भले ही इससे मांसपेशियां ऐसा नहीं कर पता लेकिन इस मशीन से आक्सीजन आराम से नहीं पहुचता है | इस मशीन की सबसे अच्छी बात यह है की यह मशीन के अंदर पंप को चालू रखता है जिससे मरीज जिन्दा रहता है |

 

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